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3.2% अधिक नेट एमिशन कर रहा है अमेरिका, जलवायु परिवर्तन के लिए बना खतरा

सीएसई की नई रिपोर्ट में अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते का उल्लंघन करने की बात सामने आई है

जून 2017 में, जलवायु परिवर्तन की सच्चाई को झुठलाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि अमेरिका 2015 के पेरिस समझौते को अब नहीं मानेगा। और न ही उत्सर्जन को रोकने के लिए किसी नीति पर काम करेगा। हालांकि ट्रम्प के न मानने के बावजूद जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई अमेरिकी राज्यों, शहरों और व्यवसायों ने इसकी रोकथाम के लिए प्रयास करने बंद नहीं किए हैं। वहां आम लोगों के समर्थन द्वारा इस बात पर जोर दिया गया कि ट्रम्प सरकार के न चाहने के बावजूद अमेरिका उत्सर्जन को रोकने के प्रयास बंद नहीं करेगा और न ही अपनी जिम्मेदारी से भागेगा। जो कि एक सराहनीय कदम है। पर क्या ये दावे और वादे सच हो सकते हैं? क्या अमेरिका वास्तव में उस दर से अपने उत्सर्जन को कम कर रहा है जिसे इस पृथ्वी के अनुकूल माना जा सकता है? और क्या राष्ट्रपति ट्रम्प और अमेरिकी सरकार की सहायता के बिना ऐसा कर पाना संभव है?

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने इन दावों की सत्यता को परखने के लिए एक विस्तृत अध्ययन किया है । जिसमें अमेरिकी अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों से हो रहे उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन की खपत का विश्लेषण किया गया है। सीएसई द्वारा जारी नवीनतम रिपोर्ट “फेडरल एमिशन एंड पेरिस कमिटमेंट” ने अमेरिका के उत्सर्जन का कच्चा-चिटठा खोल दिया है।

इस रिपोर्ट के अनुसार यदि अमेरिका के कुल उत्सर्जन की बात करें तो वो 2017 में क्योटो बेसलाइन 1990 से 3.2 फीसदी अधिक था। हालांकि यदि यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका) द्वारा खुद के लिए निर्धारित आधार वर्ष 2012 की बात करें तो उसके उत्सर्जन में कमी आयी है । लेकिन हाल के रुझानों से यह संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिकी उत्सर्जन में गिरावट की दर काफी लम्बे समय से रुक सी गई है। 

जहां वर्ष 2018 में ऊर्जा से संबंधित उत्सर्जन में वृद्धि हुई है। वहीं इसकी विकास दर पिछले 20 वर्षों में दूसरी बार इतनी अधिक हुई है। जो कि इस ओर स्पष्ट इशारा है कि अमेरिका ने ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को रोकने में जो सफलता हासिल की थी वो जल्द ही पलट सकती है। वहीं, किसी भी हालत में अमेरिका 2020 तक अपने उत्सर्जन के स्तर में जो उसने 2005 कैनकन समझौता के आधार पर 17 फीसदी कटौती का जो लक्ष्य रखा था, उसके पूरा होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। 

खपत में कमी नहीं

अमेरिका के ऊर्जा उपयोग में कोई कमी नहीं आयी है, बल्कि 1990 से 2018 के बीच उसकी ऊर्जा का उत्पादन 38 फीसदी बढ़ गया है। यदि गुड्स और सर्विस क्षेत्र के बात करें तो अमेरिका द्वारा उपयोग की जाने वाली अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली वस्तुओं ओर सेवाओं की खपत में कमी के कोई संकेत नहीं दिख रहे । यह बात ऊर्जा, प्राइवेट कार, हवाई यात्रा, स्टील, एयर कंडीशनर या बड़े घर जैसी हर वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होती है । दुनिया भर में अमेरिका में प्रति व्यक्ति वस्तुओं की खपत आज भी सबसे अधिक है । उसने आज भी कार्बन उत्सर्जन को काम करने और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली को अपनाने का कोई प्रयास नहीं किया है । वो आज भी अपने बरसों पुराने ढर्रे पर चल रहा है।  

औद्योगिक क्षेत्र के उत्सर्जन में कमी

2017 में इंडस्ट्री सेक्टर द्वारा देश के कुल उत्सर्जन का 22 फीसदी हिस्सा उत्सर्जित किया गया । वहीं 1990 से 2017 के बीच इसमें 12 फीसदी की कमी आयी है। यदि 2005 के बाद से अमेरिकी उत्सर्जन में आ रही गिरावट की बात करें, तो इसके पीछे की सबसे बड़ा वजह 1990 की तुलना में, उद्योंगों से होने वाले उत्सर्जन में आने वाली कमी है। जबकि वो कमी भी इसलिए नहीं है की अमेरिका ने इस क्षेत्र की कार्यकुशलता में कोई वृद्धि की है या फिर रिन्यूएबल एनर्जी को अपनाया है। इस कमी के पीछे की मुख्य वजह औद्योगिकीकरण में कमी से है, चूंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था बड़ी तेजी से विनिर्माण से सेवा क्षेत्र की ओर जा रही है, तो इसका साफ असर उत्सर्जन पर भी दिख रहा है। औद्योगिक वस्तुओं की खपत में कोई गिरावट नहीं आई है, इसका साफ मतलब है कि अमेरिका ने अपने उत्सर्जन को दूसरे देशों को आउटसोर्स कर दिया है। पिछले एक दशक के रुझान, जो औद्योगिक क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन की कमी की ओर इशारा करते हैं, वास्तविकता में वो एक छलावा है । जिसके चलते इस क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन की कमी से किसी प्रकार का फायदा होने की संभावना कम ही है। 

अक्षय ऊर्जा पर फोकस नहीं

सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में 1990 के स्तर की तुलना में मामूली गिरावट आई है, लेकिन इसके पीछे की वजह रिन्यूएबल एनर्जी के प्रयोग में वृद्धि का होना नहीं है । कोयले से बनने वाली बिजली के स्थान पर अमेरिका ने प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल बढ़ा दिया है, इससे उत्सर्जन में कमी आई है। अमेरिका ऊर्जा के लिए मुख्य तौर पर जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है । आज, 1990 की तुलना में उसके सतत ऊर्जा के विकास में कोई बहुत अधिक वृद्धि नहीं हुई है । वहीं ऊर्जा की बढ़ती मांग के चलते जीवाश्म ईंधन पर उसकी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है ।

बिल्डिंग क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में वृद्धि

2017 के आंकड़ों के अनुसार बिल्डिंग सेक्टर (आवासीय और वाणिज्यिक) का सम्मिलित रूप से अमेरिका के कुल उत्सर्जन में 11.5 फीसदी हिस्सा है। 1990 के मुकाबले बिल्डिंग सेक्टर से होने वाला उत्सर्जन कहीं अधिक हो गया है । हालांकि ट्रांसपोर्ट सेक्टर के उत्सर्जन में कुछ कमी आयी है । फिर भी 2005 के बाद ट्रांसपोर्ट सेक्टर से होने वाला उत्सर्जन में कमी का दौर बहुत थोड़े वक्त ही कायम रहा। अब पिछले कुछ वर्षों से यह उत्सर्जन फिर से बढ़ रहा है।

सीएसई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका चाहे किसी भी वर्ष 1990, 2005 या किसी अन्य वर्ष को आधार मान ले, लेकिन उसे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत हैं। अमेरिका ने अपने उत्सर्जन को कम करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये हैं। न ही उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कोई संकेत दिए हैं, चाहे वह खपत को कम करने की बात हो या ऊर्जा दक्षता को बढ़ाने की या अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने की, वह हर मोर्चे पर विफल रहा है । हालांकि इस दिशा में शहरों, राज्यों, निगम और आम लोगों द्वारा कुछ प्रयास किए गए है, पर वो काफी नहीं है, उनसे कोई बड़ा परिवर्तन आने की उम्मीद नहीं है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए अमेरिका द्वारा एक राष्ट्र के रूप में ठोस कदम उठाने और पेरिस समझौते के प्रति प्रतिबद्धता की जरुरत है, जिससे इन लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके । साथ ही इसके लिए पर्याप्त धन और सभी को एकजुट होकर सही दिशा में काम करने की जरुरत पड़ेगी। जिससे धरती और उसपर रहने वाले जीवों को बचाया जा सके।

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