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एसी का इस्तेमाल कम नहीं किया गया तो बिगड़ सकते हैं हालात

सीएसई ने आठ साल के बिजली खपत के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद कई महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा किया है, जो दर्शाता है कि हम जलवायु परिवर्तन और कूलिंग एक्शन प्लान के लक्ष्यों से पिछड़ सकते हैं

ऐसे समय में भारत के ज्यादातर हिस्सों में भीषण गर्मी व लू का कहर है, एयर कंडीशनर (एसी) का इस्तेमाल बढ़ गया है। इसका सीधा असर बिजली की आपूर्ति पर पड़ रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) की शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के हर घर में साल में सात महीने एसी चलाया जाए तो 2017-18 के दौरान देश में उत्पादित कुल बिजली की तुलना में बिजली की खपत 120 फीसदी अधिक हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यही हालात रहे तो राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा।

सीएसई ने अपनी एक व्यापक रिपोर्ट में राजधानी दिल्ली में बिजली की खपत से से जुड़े आठ वर्षों के ट्रेंड का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर एक घर में ऊर्जा दक्षता वाला एसी है तो वह कम से कम दिन में 30 किलोवाट प्रति घंटा बिजली की खपत करता है और जिस दिल्ली में बिजली की दर कम है, वहां भी एक एसी की वजह से एक घर के बिजली के बिल में 5000 रुपए का इजाफा हो जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि 32 डिग्री से तापमान अधिक होने पर बिजली की खपत बढ़ जाती है। दिल्ली में सामान्य तापमान 25 से 32 डिगी रहता है, लेकिन एक बार इससे अधिक हो जाता है तो लोग एसी का इस्तेमाल शुरू कर देते है और बिजली की खपत बढ़ जाती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में बिजली के 25-30 प्रतिशत वार्षिक खपत बढ़ने के लिए अधिक गर्मी जिम्मेवार है। प्रचंड गर्मी के दिनों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। सीएसई ने 7 से 12 जून के बीच किए गए एक अध्ययन किया और पाया कि इस दौरान दिल्ली में बिजली की खपत में 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है जो इस मौसम में होने वाली औसत बिजली की खपत की तुलना में काफी अधिक है।

सीएसई ने कहा है कि बेशक यह अध्ययन दिल्ली पर किया गया है, लेकिन इस तरह का प्रभाव पूरे देश में देखा जा सकता है। भविष्य में यही हाल राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि ताप सूचकांक और जलवायु परिवर्तन का दबाव देशभर में लगातार बढ़ रहा है। भारत का ताप सूचकांक 0.56 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। गर्मी (मार्च-मई) और मानसून (जून-सितंबर) के दौरान ताप सूचकांक में प्रति दशक वृद्धि दर 0.32 डिग्री सेल्सियस देखी गई है। ताप सूचकांक में बढ़ोत्तरी बीमारियों के संभावित खतरों का संकेत करती है। गर्मी के मौसम में देश के दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों (आंध्रप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु) और मानसून में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (गंगा के मैदानी भाग और राजस्थान) में यह खतरा सबसे अधिक हो सकता है।

रिपोर्ट बताती है कि यदि यही हालात रहे तो राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा। भारत पहले ही बिजली संकट का सामना कर रहा है। खासकर उन शहरों में जहां एयर कंडीशनिंग की पैठ 7-9 प्रतिशत है। भारत ऊर्जा सांख्यिकी रिपोर्ट 2018 के अनुसार 2016-17 में भारत के शहरों की बिजली की खपत में एसी की भूमिका 24.32 प्रतिशत थी। राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान में कहा गया है कि सभी भवनों के निर्माण में ऊष्मीय अनुकूलन के मापदंडों पर अमल करना जरूरी है और सस्ते आवासीय क्षेत्र को भी इस दायरे में शामिल किया जाना चाहिए।

सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी ने बताया कि गर्मी से निजात पाने के लिए व्यापक स्तर पर ऐसे भवन बनाने होंगे, जिनमें एसी का कम से कम इस्तेमाल किया जाए। साथ ही, ऊर्जा दक्षता वाले उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। ऐसा न करने पर जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े भारत के प्रयासों को गहरा धक्का लग सकता है।

इस रिपोर्ट के लेखक अविकल सोमवंशी ने बताया कि “ऊर्जा दक्षता ब्यूरो का अनुमान है कि एअर कंडीशनरों के उपयोग से कुल कनेक्टेड लोड वर्ष 2030 तक 200 गीगावाट हो सकता है। यहां कनेक्टेड लोड से तात्पर्य सभी विद्युत उपकरणों के संचालन में खर्च होने वाली बिजली से है। ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2015 में उपकरणों का कुल घरेलू कनेक्टेड लोड 216 गीगावाट था। इसका अर्थ है कि जितनी बिजली आज सभी घरेलू उपकरणों पर खर्च होती है, उतनी बिजली वर्ष 2030 में सिर्फ एअरकंडीशनर चलाने में खर्च हो सकती है।

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